धरती को स्वर्ग बनाने को, प्रेम सुधा बरसाने को, पाखंड हटाने को, मानवता फैलाने को, अज्ञान तिमिर मिटाने को, जिन्होंने किया प्रयास, फैलाया चारों ओर प्रकाश, ऐसे थे संत रविदास। ******* - मनोज कुमार 'अनमोल'
मेरी मैडम -×-×-×-×-×-×-×-×-×-×-×- मेरी मैडम कितनी अच्छी, भोली-भाली मन की सच्ची। मन लगाकर हमें पढ़ाती, सब विषयों का ज्ञान कराती। ज्ञान का दीपक हमें दिखाती, सही राह पर चलना सिखाती। खेल-खेल में हमें पढ़ाती, इसीलिए हम सबको भाती। -×-×-×-×-×-×-×-×-×-×-×-×- मनोज कुमार अनमोल रतापुर, रायबरेली (उत्तर प्रदेश)
धरने पर बैठे हैं किसान, भूखे, प्यासे और परेशानl क्या निकलेगा न कोई समाधान? क्या सोते रहेंगे हम चद्दर तान? तो फिर मत कहना यारों, जय जवान, जय किसानl देश हमारा, कृषि प्रधानl - मनोज कुमार 'अनमोल'
हिंदी हमारी मातृभाषा, हिंदी हमारी शान है। इसकी बदौलत विश्व में, अपनी अलग पहचान है। पांच उपभाषाएं हैं जिसकी, अट्ठारह है बोलियां। बावन वर्णों से सजी है, स्वर-व्यंजनों की टोलियां। लिपि है जिसकी देवनागरी, देव भाषा का अनुवाद है। है अनेकों इसकी विधाएं, जन पढ़ लेते स्वाद है। हिंदी हमारी मातृभाषा, हिंदी हमारी शान है। इसकी बदौलत विश्व में, अपनी अलग पहचान है।। आओ दृढ़ संकल्प कर लें, हम सदा ही बोलेंगे। जो बोलते विदेशी भाषा, उनके नेत्र खोलेंगे। सहज सरल है अपनी भाषा, रस की तो ये खान है। हम सब भारतीयों को, निज भाषा पर अभिमान है। हिंदी हमारी मातृभाषा, हिंदी हमारी शान है। इसकी बदौलत विश्व में, अपनी अलग पहचान है।। -×-×-×-×-×-×-×-×-×-×-×- मनोज कुमार 'अनमोल' 💐रायबरेली💐
प्यासा कौआ -------------------------------- एक कौए को लगी थी प्यास, पानी था ना उसके पास। उसने खोजा इधर-उधर, गया गांव से वो शहर। पर जल ना मिला उसे मगर, थक कर बैठ गया डाली पर। सहसा उसकी पड़ी नजर, घड़ा रखा था एक छत पर। झटपट पहुंचा वो उड़कर, बैठ गया वह घट के ऊपर। जल पीने को था वह अधीर, पर उसमें था थोड़ा सा नीर। फिर कौवे ने बुद्धि लगाई, एक सूझ उसके मन आई। झटपट लाया कुछ पत्थर, डाले उसने एक-एक कर। ज्यों-ज्यों पत्थर गिरता अंदर, जल चढ़ आता फिर निरंतर। ठंडा-ठंडा जल पीकर, उड़ गया कौवा कांव-कांव कर। ----------------------------- मनोज कुमार अनमोल रतापुर, रायबरेली उत्तर प्रदेश
आओ मिल सब पेड़ लगाएं, हरा-भरा धरती को बनाए। वृक्ष बड़े उपकारी हैं, इनकी महिमा न्यारी है। धरती मां के यह श्रृंगार, प्राणवायु के यह भंडार। मृदा क्षरण को जड़ से रोके, दूषित वायु ...
अकेले हम, अकेले तुम -×-×-×-×-×-×-×-×-×-×- अकेले हम, अकेले तुम, जहां ना कोई हो सनम। तुम मेरे पास आ जाओ, मुझसे इतना ना घबराओ, मैं तुमसे प्यार करता हूं, हर घड़ी याद करता हूं, ना होगा प्यार मेरा कम, अकेले हम, अकेले तुम, जहां ना कोई हो सनम। तुम मेरी बांहों में आ जाओ, मुझसे इतना ना शरमाओ, तुम मेरी जान हो दिलबर, ये दिल कुर्बान है तुझ पर, मैं चाहूंगा तुम्हें हरदम, अकेले हम, अकेले तुम, जहां ना कोई हो सनम। -×-×-×-×-×-×-×-×-×-×- मनोज कुमार 'अनमोल' रतापुर, रायबरेली (उ0 प्र0)