प्रकृति सुषमा
प्रकृति सुषमा
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प्रकृति की सुषमा अपार,
मन को हरती बार-बार।
जिधर भी दृष्टि जाती,
प्रकृति अपना सौन्दर्य दिखाती।
इस प्रकृति में खोकर कवि जन,
करते हैं नित नूतन वर्णन।
प्रात: होते ही दिनकर,
फैलाता है अपने रश्मि रूपी कर।
तृण पर पड़ी ओस की मुक्ता सी बूँदे,
कलरव करते तरु नीड से पक्षी कूदे।
पोखरों में सोता हुआ कमल,
खोलता है अपने पंखुड़ी रूपी नयन।
कुछ तरुओं पर खग का कूजन,
कुछ खग उड़ते मुक्त गगन।
तरुओं और लताओं का मिलन,
अरण्यों में पशु करते विचरण।
प्रातः बहती त्रिविध पवन,
छू लेती हर जन का मन।
आगन्तुक कुसुमों की सुगंध,
जब बहती है मन्द-मन्द।
पराग पान हेतु लोभी भ्रमर,
तब पुष्पों पर करता विचरण।
झरनों का पर्वत से गिरना,
नदियों का कल-कल बहना।
चंचल तितली का पुष्पों पर उड़ना,
इस प्रकृति की सुंदरता का क्या कहना।
मैं अवलोक रहा हूँ बार-बार,
इस प्रकृति का रूप और श्रृंगार।
पर मैं इस प्रकृति का कितना करूं बखान,
क्योंकि यह प्रकृति है सौन्दर्य की खान।
अब मैं प्रकृति की गोद में करूंगा विश्राम,
इसलिए मैं अपनी लेखनी को देता हूँ विराम।
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